पटना
लोजपा संस्थापक रामविलास पासवान के निधन के बाद और जदयू का विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बनने से बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को खुला छोड़ दिया गया है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि अब राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को इसमें भूमिका निभानी है। इस समय बिहार की राजनीति में बदलाव के संकेत देखने को मिल रहे हैं। राजद के साथ ही सभी प्रमुख पार्टियां बड़े पैमाने पर आंतरिक परिवर्तन और अनिश्चिचता की कगार पर खड़ी हैं।। ऐसी स्थिति में सवाल उठ रहा है कि क्या राज्य के सामाजिक समीकरण और राजनीतिक परिदृश्य में मौजूदा राजनीतिक दलों का गठबंधन भी 2024 के संसदीय चुनाव और 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव तक बना रहेगा या बदलाव देखने को मिलेगा?


दरअसल इस समय बिहार एनडीए में चार-पार्टियां बीजेपी-जेडीयू, हम और वीआईपी हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन सत्ता में है। एनडीए गठबंधन की निगाहें महागठबंधन के सहयोगियों – राजद, कांग्रेस, वाम दलों के साथ असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम पर भी लगी हैं, जिसके पांच विधायक पहली बार विधानसभा पहुंचे हैं।

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जदयू ने अपने को मजबूत करने की कवायत पहले से ही शुरू कर दी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) का पहले ही जदयू में विलय हो चुका है। कुशवाहा को जदयू संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है।

चिराग के लालू से आशीर्वाद लेने की संभावना से ‘डरे’ बीजेपी-जदयू
उधर, लोजपा में फूट पड़ गई है और दोनों गुटों में हड़कंप मच गया है। लोजपा के बड़े संसदीय दल के नेता पशुपति कुमार पारस केंद्रीय मंत्री बन गए हैं, जबकि दिवंगत रामविलास के बेटे चिराग पासवान पार्टी की कमान वापस पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। हालांकि उनके सामने विकल्प सीमित हैं। वैकल्पिक रूप से, चिराग पासवान, तेजस्वी यादव के साथ लालू यादव से आशीर्वाद ले सकते हैं।

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इस संभावना ने भाजपा और जदयू को सामाजिक समूहों और नए सिरे से गठबंधन करने के लिए मजबूर कर दिया है। पारस के लोजपा में तख्तापलट करने से पहले ही, भाजपा के प्रदेश प्रमुख डॉ संजय जायसवाल और पार्टी के सांसद जनक राम जैसे वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने दलितों के मामलों को ‘लव जिहाद’ के साथ जोड़कर ये इशारा कर दिया कि बिहार के कई जिलों में मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग दलितों को परेशान कर रहा है।

पासवानों और मांझी को लुभाने को तैयार बीजेपी
इस बीच, भाजपा के राष्ट्रीय नेता भी दिल्ली में हम (एस) नेता जीतन राम मांझी के साथ बैठक की। इस बैठक का स्पष्ट संकेत था कि भाजपा, पासवानों और मांझी (मुशहर) जाति के लोगों को दलितों के बीच लुभाने के लिए तैयार है। दरअसल पासवान और मांझी बिहार में दलित आबादी का बड़ा हिस्सा हैं।

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लव-कुश समीकरण को फिर से बनाने की कोशिश में नीतीश
इसी तरह उपेंद्र कुशवाहा को बढ़ावा देकर नीतीश ने ओबीसी समूहों में से लव-कुश (कोइरी-कुर्मी) के समीकरण को फिर से बनाने की कोशिश की है। हालांकि, नीतीश से अत्यंत पिछड़ी जाति (ईबीसी) समूहों को दूर करने का भी प्रयास किया जा रहा है, जैसा कि हाल ही में मगध क्षेत्र से जदयू के पूर्व नेता प्रमोद चंद्रवंशी ने केंद्रीय मंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह पर जुनानी हमले में देखने को मिला था।

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बिहार में शासन करने के लिए मजबूत स्थिति में एनडीए: बीजेपी
सामाजिक संयोजन में इन उभरती खींचतान, दबावों और दरारों के बावजूद, भाजपा लगभग आश्वस्त है कि एनडीए बिहार पर शासन करने के लिए सही स्थिति में है। भाजपा प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा, “चार दलीय एनडीए बिहार में भ्रष्टाचार और अपराध मुक्त राज्य देने के अपने एजेंडे पर शासन करना जारी रखेगा।” उन्होंने कहा कि “एनडीए न केवल 2024 के संसदीय चुनावों, बल्कि 2025 के विधानसभा चुनावों में भी जीत हासिल करेगा।”

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महागठबंधन में बनी रहेगी कांग्रेस
राजनीति के जानकार मानते हैं कि भाजपा और जदयू एक ही समय में राजद, लालू और तेजस्वी पर हमला करते रहते हैं, और मीसा भारती और तेज प्रताप की महत्वाकांक्षाओं को लेकर राजद और उसके मतदाताओं में यह भ्रम फैलाने की कोशिश करते हैं कि राजद नेतृत्व को पहले लालू के पारिवारिक मामलों को संभालना होगा। कभी-कभी, एनडीए खेमे से ऐसी खबर भी प्रसारित होती रहती है कि कांग्रेस विधायक, नीतीश से हाथ मिलाने के लिए पार्टी के अलग हो जाएंगे। लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरएसएस विरोधी लाइन को मजबूत किया है। जिसका अर्थ है कि राजद और कांग्रेस निश्चित रूप से गठबंधन में बनी रहेगी।

फाइल फोटो



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