हाइलाइट्स:

  • 5 गोलियां.. एक लाश.. 9 साल.. 10 लाख का इनाम
  • ‘मुखिया जी’ के कातिल का आज तक पता नहीं?
  • ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड के 9 साल
  • सीबीआई भी झेल रही नाकामी की तोहमत

पटना/ भोजपुर:
5 गोलियां… एक लाश… 9 साल… दस लाख रुपये का इनाम भी… लेकिन आज तक पता नहीं चला कि कातिल कौन है। ये बिहार के हाईप्रोफाइल हत्याकांडों में से ही एक केस है। पुलिस से लेकर सीबीआई भी आज तक ‘मुखिया जी’ के कातिल को नहीं ढूंढ पाई है।

ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड के 9 साल
एक वक्त जातीय संघर्ष की आग में सुलगते बिहार में सवर्णों के सबसे बड़े हथियारबंद संगठन रणवीर सेना सुप्रीमो की हत्या को आज 9 साल हो गए हैं। बात ब्रह्मेश्वर मुखिया (Brahmeshwar singh) की हो रही है जिन्हें उनके चाहनेवाले बरमेश्वर मुखिया (Brahmeshwar mukhiya) या मुखिया जी कहकर ही बुलाया करते थे।

1 जून 2012 को हुए इस हत्याकांड के बाद पहले बिहार पुलिस (bhojpur news) ने जांच की। बाद में परिवार वालों की मांग पर जिम्मा सीबीआई को दिया गया। पिछले साल ही सीबीआई ने इस केस की जांच के लिए आरा पहुंचकर भोजपुर जिले के एसपी के साथ इस केस के हर बिन्दु बारे में चर्चा की। इस दौरान कई तरह की जानकारियां भी ली गयी। वहीं हत्याकांड से संबंधित पुरानी फाइलों को खंगाला गया। घटना के बाद तैयार मोबाइल डाटा व कुछ नंबरों की सीडीआर भी खंगाली गयी।

आज तक कातिल अज्ञात
दो साल पहले घंटों जांच व मंथन करने के बाद टीम वापस लौट गयी। यहां तक कि कातिलों का सुराग देनेवालों को 10 लाख रुपये इनाम देने की भी घोषणा की गई है। लेकिन आज तक ये पता नहीं चला कि एक प्रतिबंधित संगठन के सुप्रीमो के जिस्म में 5 गोलियां दाग कर उन्हें मौत के घाट उतारने वाले थे कौन? कौन था इस मर्डर का मास्टरमाइंड?

सीबीआई भी झेल रही नाकामी की तोहमत
अब ये तोहमत बिहार पुलिस (bihar news) के बाद सीबीआई भी झेल रही है। मतलब ऐसे समझिए कि जुलाई 2013 में सीबीआई ने ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड की जांच शुरू की। 6 साल के अंदर लगातार पांच बार इनाम के पोस्टर भी लगवाए जा चुके है। लेकिन, उपलब्धि जीरो है। दस लाख रुपये के इनाम की राशि भी सीबीआई को मुकाम तक नहीं पहुंचा सकी है।
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हत्या और हत्या के बाद
1 जून 2012 की सुबह भोजपुर जिले के खोपिरा गांव के रहनेवाले ब्रह्मेश्वर मुखिया (brahmeshwar mukhiya) शहर के कतीरा इलाके में अपने आवास के बाहर सुबह की सैर पर निकले थे। इसी दौरान हथियारबंद अपराधियों ने उन्हें रोक कर 5 गोलियां मारीं। इस हत्याकांड के बाद भोजपुर से लेकर पटना तक सुलग गया। हाल ये हो गया कि आरा शहर पुलिस के हाथ से निकलता दिख रहा था। मुखिया समर्थकों ने सारा शहर और कानून अपने हाथ में ले लिया था। कई सरकारी गाड़ियां फूंक दी गईं।

हाल ये हो गया था कि तत्कालीन एसपी एमआर नायक मौके पर पहुंचने की कोशिश करने में एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए थे, नजदीकी थाने के बारे में तो पूछिए ही मत। लोग तत्कालीन डीजीपी अभयानंद को मौके पर बुलाने की मांग कर रहे थे। आखिर में अभयानंद वहां पहुंचे भी.. किसी तरह से लोगों को समझा बुझा कर दाह संस्कार के लिए राजी किया गया।
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जब भोजपुर से पटना तक मचा तांडव
आखिर 2 जून की दोपहर को भोजपुर से ब्रह्मेश्वर मुखिया का शव दाह संस्कार के लिए पटना निकला। लेकिन भोजपुर की सीमा पार करते ही पटना से सटे बिहटा में बीजेपी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष और सांसद सीपी ठाकुर और पूर्व विधायक रामाधार शर्मा की स्कॉर्पियो दिख गई। उसके बाद तो भीड़ बुरी तरह से भड़क गई। हाल ये हो गया कि भारी पथराव के बीच दोनों नेताओं को उनके बॉडीगार्ड गाड़ी से निकाल कर दूर ले गए। उसके बाद पटना के सगुना मोड़ से लेकर बांसघाट कर मुखिया समर्थकों ने तांडव मचा दिया। पूरी बिहार पुलिस उस वक्त बेबस हो चुकी थी।

कौन थे ब्रह्मेश्वर मुखिया
90 के दशक में बिहार की धरती रक्तचरित्र का गवाह बनी। जातीय संघर्ष के नाम पर मारकाट मची हुई थी। नक्सली जब जहां चाहें वहां लोगों की हत्या कर रहे थे। ऐसे में कई किसानों के समर्थन से ब्रह्मेश्वर मुखिया ने सितंबर 1994 में सवर्णों के नाम पर रणवीर सेना का गठन किया। रणवीर सेना और मुखिया पर आरोप लगा कि बारा और सेनारी का बदला लेने के लिए 1997 की 1 दिसंबर को लक्ष्मणपुर बाथे में 58 लोगों को मौत के घाट उतारा गया। इसके बाद बथानी टोला समेत कुछ और नरसंहारों में भी रणवीर सेना (ranvir sena) पर आरोप लगे।

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ब्रह्मेश्वर मुखिया को उस वक्त तक 277 लोगों की हत्या और उनसे जुड़े 22 अलग-अलग मामलों का आरोपी बनाया गया था। इनमें से 16 मामलों में उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था जबकि बाकी 6 मामलों में मुखिया को जमानत मिल गई।

आखिरकार 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्जीबिशन रोड से ब्रह्मेश्वर मुखिया (mukhiya) को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। तब जाकर लोगों को पता चला कि 6 फुट से भी ज्यादा लंबे ब्रह्मेश्वर मुखिया कैसे दिखते हैं। 9 साल जेल की सजा काटने के बाद आठ जुलाई 2011 को उनकी रिहाई हुई। जेल से छूटने के बाद ब्रह्मेश्वर मुखिया ने 5 मई 2012 को अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से संस्था बनाई और कहा कि वो मुख्यधारा में आकर अब किसानों के हित की लड़ाई लड़ेंगे। इसके एक महीने बाद ही उनकी हत्या कर दी गई।

अभी भी अनसुलझा है ब्रह्मेश्वर मुखिया मर्डर केस
इस हाईप्रोफाइल मर्डर केस में कई बड़े लोगों का नाम सामने आया। लेकिन अभी तक यही पता नहीं चला कि ब्रह्मेश्वर मुखिया पर गोली चलाने वाले हमलावर कौन थे। बिहार के बॉबी और गौतम-शिल्पी मर्डर केस की तरह ही ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड की गुत्थी 8 साल बाद आज भी उलझी हुई ही है।



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