संदीप पुरोहित

वनवासी व आदिवासी परम्परागत रूप से जंगल में रहते हैं। सरकार इनके रहवास को कानूनी मान्यता की मुहर भी लगाना चाहती है पर कानूनी पेचिदगियां इनके साथ न्याय नहीं होने दे रही है। यही कारण है कि 35 हजार वनवासियों को वन अधिकार पत्र (Forest Rights Act) नहीं मिल पाए। सीधे-सादे वनवासी व आदिवासी कानूनों से खेलना नहीं जानते है। यह जिम्मेदारी सरकार के अधिकारियों की है कि वे इन पेचिदगियों को दूर कर सरकार की मूल भावना के अनुरूप इन्हें वन अधिकार पत्र दें। आवश्यकता इस बात की है कि कागजों में निरस्त दावों की फिर से जांच की जाए। निरस्त दावों के लिए ग्राम सभाएं बुलानी चाहिए, दावे निरस्त होने का कारण भी बताना चाहिए, कमियों को कैसे दूर किया जाए यह जिम्मेदारी भी सरकारी एजेंसियों की ही है।

कानून की मूल भावनाओं पर अधिकारी काम करते तो 35000 लोगों के साथ न्याय हो जाता। एक्ट में इतना सरल प्रावधान है कि वन अधिकार प्रमाण पत्र का दावा करने वाले को गांव के दो बुर्जुगों का शपथ पत्र और जमीन की स्थिति क्या है इसका पंाच जनों के हस्ताक्षर वाला पंचनामा देना होता है लेकिन सरकारी सिस्टम इसको नहीं मानता है। निरस्त किए गए दावों की पुन: जांच के आदेश कई बार चले है लेकिन लालफीताशाही के शिकार होकर रद्दी के टोकरी में ही पड़े है। अगर ईमानदारी से पुन: जांच की जाए तो निश्चिय ही निरस्त किए गए दावों के आंकड़ों में भारी कमी आ जाएगी।

स्वयं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसी वर्ष बजट में घोषणा करते हुए कहा कि सामुदायिक वन अधिकार पत्र देने के लिए अप्रेल से जुलाई तक अभियान चलाया जाए लेकिन अभी तक इसको अमलीजामा पहनाने के लिए कोई बड़ा काम नहीं हुआ है। सामुदायिक अधिकार के दावों में भी धारा 3.1 के तहत नगण्य सा काम हुआ है, इसके तहत जंगल का प्रबंधन ग्राम सभा करेगी। औपचारिकता की एक बानगी देखिए सामुदायिक वन अधिकार के लिए गिर्वा पंचायत समिति ने ग्राम सभा आयोजनों का कार्यक्रम इसी महीने बनाया जो 13 जुलाई 2021 तक का था लेकिन वह भी कागजों तक ही रह गया। गांवों में इसकी सूचना ही नहीं थी। लगभग यही सूरत-ए-हाल कोटड़ा की थी।

मूल बात यह है कि वन अधिकार कानून की मंशा अधिकार देना है लेकिन अधिकार देने वाले हुक्मरान इस अधिकार को वनवासियों तक पहुंचाने में बाधा बन रहे है जबकि यह उनकी जिम्मेदारी है। वन अधिकार कानून के लिए लड़ाई लडऩे वाले संगठनों ने आला अधिकारियों के समक्ष वस्तुस्थिति की रिपोर्ट कई बार प्रस्तुत की लेकिन उन्हें भी नजरअंदाज कर दिया गया। देश में जिस तरह कई कानूनों की पालना नहीं होती है वही हाल वन अधिकार कानून का भी है।

जरूरत इस बात की है कि नए दावों से लेकर निरस्त दावों की सुनवाई के लिए प्रभावी कार्यक्रम बने। ग्राम सभा की तारीख व समय की सूचना सब तक पहुंचे, इसका प्रचार प्रसार हो। सिस्टम में काम इस तरह हो कि हाथों-हाथ ही जो भी कमी हो उसको दावेदार को बताकर पूरी करवा दी जाए। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार की मंशा से बने कानून की मूल भावना वनवासियों का कल्याण है। इसी भावना को नीचे के स्तर पर लागू करने वाली सरकारी एजेंसियों, उसके अधिकारियों को सरकार के कानून की मंशा के अनुरूप ही रणनीति बनानी चाहिए। हर हाल में वनवासियों को उनका अधिकार मिलना ही चाहिए। बेहतर होगा प्रशासन शहरों के संग कार्यक्रम के साथ-साथ प्रशासन वनवासियों के साथ कार्यक्रम भी चलाया जाए।













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