181 साल से दशहरा मैदान में डटा

झालावाड़. झालरापाटन. पूरे देश में विजयादशमी पर्व पर रावण के पुतले बनाकर उनका दहन करने की परंपरा है, लेकिन नगर में 181 वर्ष से दशहरा मैदान में रावण का पूरा परिवार साल भर जमा रहता है। यह परिवार रियासत काल से ही यहां पर स्थापित है। हालांकि विजयादशमी पर्व पर यहां पर भी दहन तैयार किए जाने वाले पुतलों का ही किया जाता है।झालावाड़ रियासत के प्रथम महाराज राणा मदन सिंह झाला ने 1840 में इंदौर मार्ग पर स्थित मेला मैदान में मिट्टी से रावण के कुनबे का निर्माण कराया था, तब से यहां दशहरा मनाया जाता है। पहले मिट्टी के पुतले की नाभि में लाल रंग से भरा कलश रखकर तीर मारा जाता था और रावण वध की परंपरा निभाई जाती थी। इसके बाद वर्ष 1920 में राणा भवानी सिंह ने रावण के कुनबे का मिट्टी और पत्थर से निर्माण कराया। इसके बाद से ही रावण परिवार के दरबार ने स्थाई रूप ले लिया और यह दरबार साल भर मैदान में डटा रहता है। समय बीतने के साथ रावण दहन कार्यक्रम की जिम्मेदारी नगर पालिका ने ली। तब से उसने इन पुतलों को और मजबूत बनाया और प्रतिवर्ष इन पर रंग रोगन कराना शुरू किया। रावण मंदोदरी, मारीच, सूर्पनखा, द्वारपाल और जमीन पर लेटे कुंभकरण के विशालकाय पुतलों को लोग देखने के लिए आते हैं। दशहरा मैदान में स्थित रावण दरबार के बारे में बुजुर्ग लोगों का कहना है कि जब बच्चों को बुरी नजर लग जाती है तो वह लोग दशहरे मैदान में रावण दरबार पहुंचते हैं और वहां बच्चों का शीश नवाते हैं और उसकी मिट्टी सिर पर लगा देते हैं जिससे बच्चों की बुरी नजर उतर जाती है। रावण का यह दरबार लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। कोरोना गाइडलाइन के चलते यहां पर विजयादशमी पर्व पर दशहरा पर्व पर सांकेतिक पुतले का दहन किया जा रहा है, लेकिन स्थाई रूप से बने इन पुतलों का रखरखाव परंपरा अनुसार नगर पालिका
करवा रही है।





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