करौली. जिला मुख्यालय पर एक दशक पहले रोडवेज डिपो की मिली सौगात के कागजों में ही मुस्कुराने से जिले के विभिन्न इलाकों के बाशिंदे समुचित परिवहन सेवाओं के लिए तरस रहे हैं।

करौली. जिला मुख्यालय पर एक दशक पहले रोडवेज डिपो की मिली सौगात के कागजों में ही मुस्कुराने से जिले के विभिन्न इलाकों के बाशिंदे समुचित परिवहन सेवाओं के लिए तरस रहे हैं। अनेक बार स्थानीय स्तर से लेकर उच्च स्तर तक करौली रोडवज डिपो के स्वतंत्र संचालन की मांग उठ चुकी है, लेकिन प्रभावी पहल के अभाव में यह मांग दबी हुई है। नतीजतन जिले के विभिन्न क्षेत्रों के बाशिंदों को परिवहन सुविधाओं से महरूम होना पड़ रहा है। चूंकि करौली जिले का अधिकांश हिस्सा डांग क्षेत्र है, जहां सैंकड़ों गांव-ढाणियां डांग क्षेत्र में बसी हुई हैं। इन क्षेत्रों के बाशिंदों को समुचित परिवहन सेवाएं नहीं मिल पाती हैं। नतीजतन उन्हें परेशानी झेलनी पड़ती है।

हाल ही में राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक की ओर से रोडवेज के प्रदेश के आठ जोनों में अप्रेल माह में सर्वाधिक राजस्व आय अर्जित करने वाले डिपो की घोषणा में करौली डिपो भी शामिल है। भरतपुर जोन के करीब आधा दर्जन डिपो में सर्वाधिक राजस्व आय अर्जित करने पर करौली को जोनल डिपो ऑफ दी मन्थ घोषित किया गया है। ऐसे में एक बार फिर शहरवासियों ने सरकार से डिपो के स्वतंत्र संचालन की मांग उठाई है। उनका कहना है कि जब करौली डिपो बेहतर राजस्व आय अर्जित कर रहा है तो फिर इसका स्वतंत्र रूप से संचालन क्यों नहीं किया जा रहा है। इसके लिए क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को सरकार स्तर पर प्रभावी पहल करनी चाहिए, ताकि क्षेत्र के बाशिंदों को समुचित परिवहन सेवाएं मिल सकें।

बसें भी कार्मिक भी, फिर भी नहीं स्वतंत्र संचालन
रोडवेज निगम के सूत्र बताते हैं कि करौली आगार की पृथक से बसें आवंटित हैं, कार्मिक भी हैं। आय-व्यय का ब्यौरा भी पृथक से है। बावजूद इसके करौली आगार का संचालन पूरी तरह हिण्डौन आगार के अधीन है। वहीं से बसों के शिड्युल आदि तय किए जाते हैं, जिसके चलते करौली के नाम से आवंटित बसों का भी पूरी तरह क्षेत्र के लोगों को लाभ नहीं मिल पाता है। असल में पहले सरकार स्तर पर उचित राजनीतिक पहल के अभाव में वर्ष 2012 में उद्घाटन के बाद से ही जनप्रतिनिधियों ने खास रुचि नहीं दर्शाई। नतीजतन कुछ वर्ष पहले यहां के मुख्य प्रबंधक को हटाते हुए हिण्डौन के अधीन ही करौली डिपो को कर दिया गया। वहीं धीरे-धीरे यहां से कर्मचारियों को भी हिण्डौन डिपो में ही बुला लिया गया।

कई मार्गों पर बसों का टोटा
रोडवेज सूत्र बताते हैं कि करौली डिपो के नाम से एक दर्जन से अधिक बसें आवंटित हैं, लेकिन इनमें से महज 5-6 बसों का ही करौली बस स्टैण्ड से यात्रियों को लाभ मिल पा रहा है। ऐसे में ना केवल लम्बी दूरी की बसों का यहां से अभाव है, बल्कि जिले के बड़े कस्बों के लिए भी पर्याप्त रोडवेज बस सेवा नहीं है। वर्तमान में मासलपुर कस्बे के लिए तो कोई बस संचालित ही नहीं, जबकि करणपुर के दो बसें, मण्डरायल तथा सपोटरा के लिए महज एक-एक बस संचालित हैं। इनमें से एक भी बस करौली डिपो की नहीं है, बल्कि अन्य डिपो की हैं।
वहीं लम्बी दूरी की बसों की स्थिति देखें तो करौली से सौरोजी के लिए वर्तमान में बस ही नहीं है। वहीं प्रसिद्ध आस्थाधाम कैलादेवी के लिए सुबह जल्दी यात्रियों का जाना शुरू हो जाता है, लेकिन स्थानीय बस स्टेण्ड से पहली बस की रवानगी ही सुबह 8 बजे है।









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