कोरोना संक्रमण के चलते पिछले साल से स्कूल बंद है, जो इस सत्र में भी खुलने की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि अब स्वास्थ्य विभाग तीसरी लहर आने की संभावना जता रहा है। इस तीसरी लहर में बच्चों के प्रभावित होने की बात कही जा रही है, जिससे सरकार ने अभी स्कूल नहीं खोलने का मानस बना रखा है। सरकार का यह फैसला स्कूल संचालकों व शिक्षकों पर तो भारी पड़ ही रहा है साथ ही यूनिफॉर्म और स्टेशनरी विक्रेताओं को भी मुसीबत में डाल दिया है

झालरापाटन. कोरोना संक्रमण के चलते पिछले साल से स्कूल बंद है, जो इस सत्र में भी खुलने की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि अब स्वास्थ्य विभाग तीसरी लहर आने की संभावना जता रहा है। इस तीसरी लहर में बच्चों के प्रभावित होने की बात कही जा रही है, जिससे सरकार ने अभी स्कूल नहीं खोलने का मानस बना रखा है। सरकार का यह फैसला स्कूल संचालकों व शिक्षकों पर तो भारी पड़ ही रहा है साथ ही यूनिफॉर्म और स्टेशनरी विक्रेताओं को भी मुसीबत में डाल दिया है। क्योंकि उनका धंधा पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है। स्कूल में लगने वाली स्टेशनरी की बिक्री मात्र 25 प्रतिशत हो रही है। 75 प्रतिशत स्टॉक व्यवसाय करने वालों के गोदाम में भरा पड़ा हुआ है। जिससे कई दुकानदार स्टॉक मंगा लेने के कारण कर्जदार हो गए है। कस्बे में एक दर्जन से अधिक स्टेशनरी एवं मुख्य तौर से करीब 5 व्यापारी स्कूल यूनिफॉर्म का कारोबार करते हंै। इन विक्रेताओं की माने तो उनका 2 करोड़ रुपए का व्यवसाय ठप हो गया है। इन व्यापारियों की परेशानी यह है कि यदि प्राइवेट स्कूलों ने दो साल बाद यूनिफॉर्म बदल दी तो उनके गोदाम पर रखी यूनिफॉर्म खराब हो जाएगी और उनकी बड़ी रकम फंस जाएगी। कस्बे में 22 से अधिक निजी विद्यालय है। जिसमें व्यापारियों का यूनिफॉर्म और स्टेशनरी का प्रतिवर्ष डेढ़ से दो करोड़ रुपए का व्यापार होता है। जो कोरोना काल के कारण 40 से 45 लाख रुपए पर सिमटकर रह गया है। इसी कारण स्टेशनरी वालों ने इस बार नया माल नहीं मंगवाया है। यही हाल यूनिफॉर्म व्यवसायियों का भी है। प्राइवेट स्कूलों में करीब 10 हजार बच्चें अध्ययन करते हंै। कक्षा 1 से 12वीं तक के बच्चों का औसत अगर निकाला जाए तो प्रत्येक बच्चें पर एक हजार रुपए स्टेशनरी का खर्च आता हैं, वहीं यूनिफॉर्म पर प्रत्येक बच्चे का औसत 500 रुपए खर्च आता है। कुछ बच्चें पुरानी यूनिफॉर्म व किताबों से काम चला लेते है तो ज्यादातर बच्चें नई यूनिफॉर्म व स्टेशनरी खरीदते है। इस हिसाब से प्रत्येक साल करीब 2 करोड़ का व्यवसाय होता है।
स्कूल नहीं खुलने से स्कूल संचालक ज्यादा तनाव में है। कई संचालक ऑनलाइन तरीके से बच्चों की पढ़ाई तो शिक्षकों से करवा रहे है, लेकिन बच्चों की फीस स्कूल में जमा नहीं हो रही। जिससे उन्हें शिक्षकों को वेतन देने में परेशानी आ रही है। वहीं किराए के भवनों में संचालित स्कूल का किराया नहीं चुकाए जाने से दिनोंदिन कर्ज बढ़ता जा रहा है। रोजमर्रा खर्च चलाने के लिए संचालक ऐन केन तरीके से काम चला रहे है। कोरोना महामारी के कारण दो सत्र से बंद पड़े निजी स्कूलों में कार्यरत शिक्षक इन दिनों काफी समस्या का सामना कर रहे हंै। कई स्कूलों में कुछ ही शिक्षकों से अध्यापन कार्य करवाया जा रहा है। शेष शिक्षकों को काम पर आने से मना कर दिया गया है। अन्य स्कूलों में शिक्षकों से ऑनलाइन अध्यापन के बाद भी अभिभावकों की ओर से बकाया शुल्क जमा नहीं कराने से कार्यरत शिक्षकों को मानदेय नहीं मिल रहा। कई जगह तो स्थिति ऐसी है कि फीस जमा नहीं करते हुए अभिभावक बच्चों को अन्य स्कूलों में प्रवेश करवा रहे है। जिससे शिक्षक व स्कूल संचालक आर्थिक संकट में है।





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